घर के अंदर हल्की-सी खामोशी थी…बाहर हवा पेड़ों से टकरा रही थी, और अंदर दो लोग एक ऐसे सच के पास खड़े थे जिसे अभी कोई समझ नहीं पा रहा था।कृष्णा ने धीरे से पूछा—वैसे… तुम यहाँ कब से रह रही हो?राधा ने कुछ पल उसे देखा…फिर धीरे से बोली—पता नहीं…जब मेरी आँख खुली… तो मैं यहीं थी।उसकी आवाज़ में सच्चाई थी…लेकिन एक खालीपन भी।वो आगे बोली—मुझे तो अपना नाम भी नहीं पता था…कृष्णा चुप हो गया।कृष्णा ने धीरे से पूछा—फिर तुम्हारा नाम राधा कैसे पड़ा?राधा ने अपना दाहिना हाथ आगे कर दिया।बोली - देखिए…मेरे हाथ पर लिखा है…उसने अपनी हथेली