उधर वो लड़की आखिरकार अपने घर के बाहर पहुँचती है।थकी हुई साँसें… माथे पर पसीना… और अभी भी हल्का सा बुखार।वो जैसे ही बेल दबाने के लिए हाथ बढ़ाती है—दरवाज़ा अपने-आप खुल जाता है।सामने खड़ा था एक 16 साल का दुबला-पतला लड़का, बाँहें सीने पर बाँधे, बिलकुल मकान मालिक की तरह अकड़ में।लड़का (कड़क आवाज़ में):“तुम्हें कितनी बार कहा है टाइम से घर आया करो!लेकिन तुम मानती ही नहीं!आखिर तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है?किराए पर रहती हो, तो अच्छी किरायेदार बनकर रहा करो!”वो लड़की थकी हुई, ठंड में कँपकँपाती हुई…और हल्की सी शर्मीली मुस्कान देकर बोलती है—“सॉरी मकान मालिक जी… इस