ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या "अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ --जुआ मत खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ) के दुष्परिणामों से सावधान करता है और परिश्रमपूर्ण जीवन का उपदेश देता है।" अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व"— ऋग्वेद 10/34/13पदच्छेदअक्षैः = पासों से, जुए सेमा = मतदीव्यः = खेलो, जुआ खेलोकृषिम् = खेती, कृषिइत् = हीकृषस्व = करो, अपनाओभावार्थ“जुआ मत खेलो; खेती और परिश्रम का कार्य करो।”विस्तृत व्याख्यायह मन्त्र मनुष्य को अनैतिक एवं विनाशकारी प्रवृत्तियों से दूर रहने की शिक्षा देता है। जुआ व्यक्ति की बुद्धि, धन, परिवार और सम्मान को नष्ट कर सकता है; जबकि कृषि और श्रम जीवन में स्थिरता, समृद्धि और