ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या "कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जागने वाला प्रबुद्ध होता है। उसे सब स्नेह करते हैं।जो मनुष्य कर्म करके (कृत्वा), चेतन और सजग (चेतिष्ठः) रहता है, वह समस्त लोगों के लिए प्रिय, हितकारी और स्नेह का पात्र (विश्वार्मभूत) बन जाता है।अर्थात् — जो प्रातःकाल जागकर कर्मशील और जागरूक रहता है, वह प्रबुद्ध होता है और सबका प्रिय बनता है।विस्तृत व्याख्या--कृत्वा — केवल विचार नहीं, बल्कि कर्तव्य-कर्म का आचरण।चेतिष्ठः — चेतन, जाग्रत, सजग और विवेकयुक्त।विश्वार्मभूत — जो सबके लिए स्नेह, शांति और हित का कारण बने।यह मंत्र बताता है