ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्या ऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत करो, पीछे मत हटो।”यहाँ—मा = मत / नहींस्रेधत = ढीले पड़ना, शिथिल होना, उत्साह खोनाअतः इसका सरल हिन्दी अर्थ — “आलस्य मत करो, निरन्तर कर्मशील रहो।”ऋग्वेद ७/३२/९ का पूरा मंत्र —मा स्रे॑धत सोमिनो॒ दक्ष॑ता म॒हे कृ॑णु॒ध्वं रा॒य आ॒तुजे॑ ।त॒रणि॒रिज्ज॑यति॒ क्षेति॒ पुष्य॑ति॒ न दे॒वासः॑ कव॒त्नवे॑ ॥— ऋगुवेद भावार्थ :हे सोमयाग करने वालों! आलस्य मत करो, कर्मठ बनो और महान ऐश्वर्य के लिए प्रयत्न करो।उद्योगी मनुष्य ही विजय पाता है, स्थिर रहता है और उन्नति करता है; देवता आलसी या अकर्मण्य व्यक्ति का