निलु के मन मे कुम्भन का डर सता रहा था । इसिलिए वो अपना हाथ के रस्सी को जल्दी जल्दी खोल लोता हो और जैसे ही अपमे पैर की रस्सी को खोलने जाता है के तभी वहां पर कुंम्भन आ जाता है। कुंम्भन को दैख कर निलु की जान हलक मे आ जाती है। निलु झट से रस्सी को जैसे तैसे लपेटकर वहा पर लेट जाता है और बेहोश होने का ढोंग करता है। तभी वहां पर कुम्भन आ जाता है और निलु को बेहोश दैखकर कहता है। " लगता है ये अभी तक मूर्छित है। जब तक ये मूर्छित है मैं