मुझे दो दिन बाद होश आया था। डाक्टर नर्सस और जान पहचान के सभी लोगों ने मेरी बचने की उम्मीद पूरी तरह से खो दी थी। जैसे कि बीच नदी के पहुँचते ही भंवर उठने पर मल्लाहें सभी तरह की आशाओं को छोड़कर निराशाओं के भंवर में फंस जाते हैं। और दूसरी बार जोरदार तूफानी लहरों के उठने से पहले ही संभवतः सब कुछ समाप्त सा लगने लगता है।अम्मा बाबूजी का भी यही सब हाल था। सभी ने मेरे लिए दो चार आंसू बहाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। लेकिन किसी को क्या पता था कि मैं भी फिनिक्स पंछी