लखनऊ की उस काली और जर्जर मिल में जो धमाका हुआ था, उसकी गूँज शायद मीलों दूर तक सुनाई दी थी, लेकिन कबीर मेहरा के कानों में उस वक्त सिर्फ एक ही आवाज गूँज रही थी—सिया के जलते हुए पैरों की वह खामोश चीख. कबीर, जो खुद मार्शल आर्ट्स का माहिर था और जिसका शरीर लोहे जैसा सख्त था,आज अपनी ही बाहों में सिमटी उस लडकी के वजन से कांप रहा था. कबीर के अपने शरीर पर अनगिनत घाव थे; रणविजय के गुंडों के साथ हुई उस खूनी लडाई में उसकी पीठ पर लोहे की रॉड के निशान थे, उसके