Ishq ka Ittefaq - 11

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रात के दो बज रहे थे जब कबीर की काली एसयूवी मेहरा मेंशन के भारी गेट को खोलती हुई अंदर दाखिल हुई. हेडलाइट्स की तेज रोशनी में सफेद गुलाब के पौधे थरथरा रहे थे, मानो वो भी इस नई हलचल को महसूस कर रहे हों. कबीर ने गाडी का इंजन बंद किया, पर उसका हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही जमा रहा. उसके बगल वाली सीट पर सिया बैठी थी, जिसकी नजरें बाहर अंधेरे में कहीं खोई हुई थीं. पूरे रास्ते दोनों के बीच एक शब्द का भी लेन- देन नहीं हुआ था. कबीर ने बिना सिया की तरफ देखे, ठंडी