Ishq ka Ittefaq - 9

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मेहरा मेंशन की सुबह आज किसी भारी पत्थर की तरह उगी थी. सूरज की किरणें खिडकियों से छनकर अंदर तो आ रही थीं, लेकिन घर के माहौल में जो एक चमक हुआ करती थी, वो गायब थी. कबीर अपने कमरे की बालकनी में खडा नीचे बगीचे को देख रहा था. कल रात की उस पार्टी की गूँज अब भी उसके कानों में शोर मचा रही थी.कबीर के चेहरे पर आज वो पुराना आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि एक अजीब सी कशमकश थी. उसका मन उसे बार- बार कह रहा था कि उसने गलत किया, पर उसका ईगो, उसका घमंड अब भी