इश्क और अश्क - 88

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वोआसमान में कनिष्क उड़ रहा था।प्राणली उसकी पकड़ में थी।नीचे जंगल था। पेड़ थे। अँधेरा था।प्राणली छटपटा रही थी।पर कनिष्क की पकड़ —लोहे जैसी थी।"देवी।" कनिष्क ने कहा। "अब गरुड़ लोक चलना होगा।""मैं कहीं नहीं जाऊँगी।""ये आपकी मर्ज़ी पर नहीं है।"प्राणली ने चारों तरफ़ देखा।रास्ता नहीं था।तभी —एक आवाज आई।पत्तों की सरसराहट।टहनियों का टूटना।और अविराज निकला।घायल था।बाँह पर खून था।चेहरे पर ख़रोंचें थीं।पर आँखों में —वो आग थी।"प्राणली।"उसने उसे देखा।बस एक पल।फिर कनिष्क को।"छोड़ दो उसे।"कनिष्क ने उसे देखा।और हँसा।पर इस बार हँसी में थकान थी।"अविराज। तुम यहाँ?""हाँ।" अविराज ने तलवार निकाली। "यहाँ।"कनिष्क ने एक पल सोचा।फिर प्राणली को एक