कॉरिडोर का वो अंधेरा कोना अब भी कबीर मेहरा की भारी साँसों से सुलग रहा था.सिया तो अपने सधे हुए कदमों से गेस्ट- हाउस की तरफ जा चुकी थी, लेकिन उसकी आखिरी बात—" देखते हैं पहले किसका गुरूर टूटता है" —कबीर के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी.कबीर ने गुस्से में अपने हाथ की मुट्ठी भींची और पास लगी नक्काशीदार दीवार पर दे मारी. दर्द की एक तीखी लहर उसकी उंगलियों से होती हुई कंधे तक गई, पर उसका ध्यान अपनी हथेलियों के दर्द पर नहीं, बल्कि दिल के उस कोने पर था जो सिया