भक्त को भय नहीं

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ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त, तृतीय मंत्र में आता है।पद–विश्लेषण (संक्षेप में)दिप्सन्त – हानि करने की इच्छा रखने वालेइद् रिपवः – ये शत्रुन आह देभुः – दबा नहीं सकते / पराजित नहीं कर सकतेभावार्थ--हे प्रभु! जो दुष्ट और शत्रुजन हानि पहुँचाने की इच्छा रखते हैं, वे आपके भक्त/सेवक को दबा या पराजित नहीं कर सकते। आपकी कृपा और संरक्षण से साधक निर्भय रहता है।गूढ़ अर्थ--यह मंत्र बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आन्तरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की ओर भी