उपकारहीन कृपण

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ऋगुवेद सूक्ति--(२६) की व्याख्या मंत्र:अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।— ऋग्वेद १.१२५.७भावार्थ --उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है।पदच्छेद--अपृणन्तिम् + अभि + सं + यन्ति + शोकाःशब्दार्थ--अपृणन्तिम् — जो न पूरयति, दान न देता, उपकार न करने वाला (कृपण)अभि सं यन्ति — चारों ओर से आ घेर लेते हैंशोकाः — दुःख, संतापभावार्थ--जो व्यक्ति दूसरों की सहायता नहीं करता, दान या उपकार नहीं करता, उस कृपण को शोक और दुःख चारों ओर से घेर लेते हैं।“उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” ऋग्वेद 1.125.7 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—मा पृणन्तो दुरितमेन आरन् मा जारिषुः सूरयः सुव्रतासः।अन्यस्तेषां परिधिरस्तु कश्चिदपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः॥लिप्यंतरण (IAST):mā pṛṇanto duritam