ज्ञानी भ्रमित नहीं होता

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ऋगुवेद सूक्ति--(२८) की व्याख्या  मन्त्र--“उत देवा अवहित देवा: उन्नदेवा पुनः:”। --ऋग्वेद १०.१३७.१भावार्थ --गिरे हुओं को पुनः उठाओं।यह मन्त्र ऋग्वेद के दशम मण्डल, १३७वें सूक्त का प्रथम मन्त्र है। यह सूक्त औषधि और आरोग्य के सन्दर्भ में माना जाता है।पदच्छेद--उत देवा अवहितं  देवा उन्नयत पुनः ।भावार्थ--हे देवस्वरूप विद्वानों! जो मनुष्य किसी कारण से गिर गया है (रोग, दुःख, अज्ञान या निराशा में), उसे फिर से उठाइए, उसका उत्थान कीजिए।यहाँ “देव” शब्द का अर्थ केवल स्वर्गीय देवता न होकर प्रकाश देने वाले, ज्ञानवान, हितकारी पुरुष भी होता है।“अवहित” = जो नीचे गिरा हुआ, पतित या दुर्बल हो गया हो।“उन्नयत” = ऊपर उठाना, उन्नति