मारे घर की बड़ी सी खिड़की से तकरीबन एक नन्हें से बच्चे के नन्हें नन्हें दस बारह हाथ की ही दूरी पर लगे हुए आम्रवृक्ष की ऊर्ध्वाधर तन्वंगी शाखा पर बने छोटे से नीड़ में पल रहे दो पंछियों के नन्हें नन्हें बच्चे वक्त के बढ़ते कदमों की तरह अपने पंख लगा कर ना जाने कब के उड़ चुके थे और उस दीर्घकालिक थकान और उड़ान भरने के साथ ही ही मैं भी पहले से कुछ और बड़ी हो गई थी। उस वर्ष मैं बारह वर्ष की हो चुकी थी। लेकिन अभी तक भी मुझे मेरे बचपन ने छोड़ने के लिए