जंगल - 38

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--------------उलझन (3) जगल पस्तक मे दर्ज किया गया है... जो ये जानता है कि रास्ते खुद बे खुद बन जाते है। फिर काफ़ले निकल पड़ते है।                         जैसे साप दृष्टि मित्र  झपकनी नहीं है। वैसे ही सब काम एकाग्र मन से करो। करते रहो....मै गंगा तट को निहारे जा रहा था। मेरी सोच गंगा की लहरों मे डुबकी लगाए थी। आँखे बंद थी। खुद पर ही केंद्रिक कितनी वार कर चूका था। दिसबर का महीना था.... ठंड थी। पर शरीर को भी साधना जरूरी, कितनी ठंड सेह सकता था... गुरू