अप्प दीपो भवः...- बोधार्थी रौनक़ ।

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रांची की वह सुबह आज भी याद है...ठंडी हवा थी...सड़कें धीरे-धीरे जाग रही थीं...और मैं किताबों की तलाश में था।किताबें...जो सिर्फ पन्ने नहीं होतीं...कई बार वे मनुष्य को नया मनुष्य बना देती हैं...मेरे साथ साईं भाई थे...चेहरे पर सहज मुस्कान...बातों में अपनापन...और कदमों में अजीब सा धैर्य...हम एक दुकान से दूसरी दुकान घूम रहे थे...कहीं बुद्ध पर पुस्तक नहीं मिली...कहीं गांधी की किताब अधूरी थी...कहीं राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक आउट ऑफ स्टॉक...लेकिन यात्रा सिर्फ पुस्तक खोजने की नहीं थी...वह जीवन को समझने की यात्रा बनती जा रही थी...चलते-चलते साईं भाई ने कहा -“बुद्ध को पढ़ना आसान है...लेकिन बुद्ध जैसा चलना