तपती दोपहरी

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तपती दोपहरी बैसाख की तपती दोपहरी…आसमान से आग बरस रही थी।ऐसा समय, जब लोग घर से बाहर निकलने से भी कतराते हैं।पुराने बाज़ार के एक कोने में राजू अपनी रिक्शा लेकर खड़ा था।सामने सत्तू की छोटी-सी दुकान…जहाँ इक्का-दुक्का लोग आकर प्यास बुझा रहे थे।राजू का मन लस्सी पीने का हुआ।उसने जेब टटोली…कुछ सिक्के… कुछ मुड़े हुए नोट…“इतने में तो बस सत्तू ही मिलेगा…”उसने एक लंबी साँस ली—“नहीं… अभी नहीं…”इच्छा को दबाकर वह आगे बढ़ गया।रामविलास—पुराने बाज़ार का नामी व्यापारी।मीठी बोली, हँसमुख चेहरा…सालों की मेहनत से खड़ी की गई दुकान।राजू वहीं काम करता था।ईमानदार, फुर्तीला और चुपचाप अपना काम करने वाला।कभी-कभी