जंगल - 37

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"उलझन "----------गंगा के तट पर बैठा " कहा चला गया था, इतना गंभीर हो गया था " ये अभ्यास मुझे तीन चार साधु की संगत मे बैठा रात को दाल भात की प्रसादी ग्रहन की। फिर सब लगे मुझे की सब एक नये सकून मे है। " बेटा नये आये हो, पजामे और ऊपर कोई वस्त्र नहीं, जानऊ धारण किये हो... " मैंने कहा जी गुरु जी... मै अभागा बालक की तरा हूँ... मै सकून की अवस्था मे ग्रहण के लिए आपकी संगति मे आया हूँ.." एक बजुर्ग हस पड़ा.... " बेटा मन को रोक लो, बस यही एक तपस्या