मुक्ति की कामना

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ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या "स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् । अति । द्विषः शब्दार्थसः – वह (परमात्मा)नः – हमें / हमारापर्षत् – पार कराए, बचाएअति – ऊपर से, पारद्विषः – द्वेष करने वाले, शत्रु, कष्ट देने वालेभावार्थवह परमात्मा हमें द्वेष करने वालों और सभी कष्टों से पार करा दे, हमारी रक्षा करे।व्याख्या--इस मंत्र में प्रार्थना की गई है कि परमात्मा मनुष्य को द्वेष, शत्रुता, बाधा और दुःखों से बचाकर सुरक्षित मार्ग पर ले जाए। यहाँ “द्विषः” का अर्थ केवल बाहरी शत्रु ही नहीं, बल्कि भीतर के दोष—क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि भी