सस्सी–पुन्नू - 6

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सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी… आसमान हल्का-सा धुँधला था, जैसे रात और दिन के बीच कोई खामोश समझौता चल रहा हो। हवा में ठंडक थी, पर उसके भीतर एक हल्की-सी बेचैनी भी घुली हुई थी जैसे आज कुछ अलग होने वाला हो। सस्सी बहुत जल्दी उठ गई थी, बिना किसी वजह के… या शायद एक ऐसी वजह के साथ, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसने आँगन में कदम रखा, और कुछ पल वहीं खड़ी रह गई सिर्फ हवा को महसूस करते हुए… जैसे वही उसे कुछ बताने वाली हो।गाँव धीरे-धीरे जाग रहा था,