उसे अपने सीने से लगा लिया।प्राणली ने पहले हिचकिचाया।एक पल के लिए।बस एक पल।और फिर —वो टूट गई।उसने उसकी कमीज़ मुट्ठी में भींच ली।और रोने लगी।ऐसे —जैसे बहुत दिनों से रोकी थी।जैसे थकी हुई थी —मज़बूत दिखते-दिखते।वर्धान ने कुछ नहीं कहा।एक शब्द नहीं।उसने बस —उसे और क़रीब खींचा।एक हाथ उसकी पीठ पर।दूसरा उसके बालों में।,वो जानता है ये गलत पर ये पर उसे इस पल इसी सुकून की जरूरत थी, एक पल के लिए सही गलत सब भूल जाना चाहता है वो, वो खुद से यही सवाल कर रहा है कि क्यों अब कुछ साधारण नहीं हो सकता , गरूड़