सुबह का उजाला धीरे-धीरे रेगिस्तान की ठंडी रेत पर फैल रहा था… रात की नमी अभी पूरी तरह गई नहीं थी, और हवा में एक हल्की-सी ठंडक बाकी थी, जो हर साँस के साथ अंदर उतरकर मन को शांत कर देती थी। आसमान हल्का नीला था,और सूरज अभी क्षितिज के किनारे से झाँक रहा थाजैसे धीरे-धीरे दुनिया को जगाने की तैयारी कर रहा हो। गाँव अपनी रोज़ की लय में जागने लगा था… कहीं चूल्हे जलने की खुशबू, कहीं पानी भरने जाती औरतों की धीमी बातेंऔर इन सबके बीच, सस्सी अपने आँगन में खड़ी थी—चुप, स्थिर… जैसे किसी अनकहे एहसास