दोपहर का वक्त था…सूरज आसमान के बिल्कुल बीचों-बीच ठहरा हुआ था, और उसकी तपिश रेत को इस तरह जला रही थी जैसे हर कण में आग भर दी गई हो। हवा चल तो रही थी, पर उसमें ठंडक नहीं थीबस गर्मी का बोझ था, जो साँसों के साथ भीतर उतरता चला जाता था। दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान अपनी उसी पुरानी खामोशी में डूबा था… लेकिन उस खामोशी के भीतर अब एक हल्की-सी हलचल थी जैसे कोई कहानी धीरे-धीरे आकार ले रही हो।सस्सी अब बच्ची नहीं रही थी।वक्त ने उसकी मासूमियत को छुआ नहीं था… बस उसे और गहरा कर दिया