धागा टूटा।और उसी पल —कनिष्क हँसा।इतने ज़ोर से।इतनी खुशी से।जैसे सालों से कोई चीज़ चाहता था — और आज मिल गई।उसकी हँसी मंडप की छत से टकराई। दीवारों से टकराई। वापस आई।वो हँसता रहा।रुका नहीं।और फिर —उसने इशारा किया।बस एक इशारा।और युद्ध शुरू हो गया।तलवारें टकराईं।आवाज़ें उठीं।मशालें गिरीं।मंडप — जो कुछ देर पहले फूलों और मंत्रों से सजा था —अब लहू और धुएँ की जगह बन गया।अविराज ज़मीन पर था।धागा टूटने की आवाज़ अभी भी उसके कानों में थी।उसने देखा —वर्धान डगमगाया था।कनिष्क हँस रहा था।और प्राणली —प्राणली की आँखें उस टूटे हुए धागे पर थीं।मैंने क्या किया।पूरी बात समझ