शहनाई अभी भी बज रही थी।किसी को ख़बर नहीं थी कि रोकें।बाहर ढोल था। हँसी थी। फूल थे।लगता है यहां मेल मिलाप पहले ही हो चुका है(किसी की आवाज आई ।)एक पल में सब बंद ...शहनाई , ढोल सबसबकी नजर मुख्य द्वार पर।। ।ये कनिष्ठ ही था।भीतर —भीतर तलवारें थीं।कनिष्क चल रहा था।धीरे-धीरे।जैसे वो किसी बाज़ार में टहल रहा हो।जैसे उसे पता हो — ये जगह उसी की है।हर क़दम पर उसके जूते की आवाज़ फर्श पर गूँज रही थी —ढम।ढम।ढम।मंडप के फूल हवा में काँप रहे थे।दीपों की लौ थरथराई।जैसे वो भी डर गई हों।परास की नज़र उस पर