पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 5

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कुछ ही दिनों में हालात बदल गए…कृष्णा का फैसला पक्का था…और सिद्धिका अब भी उलझी हुई थी पर किसी अजीब सी खामोशी में उसने हाँ कह दिया था।आज पहली बार…सिद्धिका एक मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी थी। चारों तरफ घंटियों की आवाज़…अगरबत्ती की खुशबू…और भक्तों की भीड़…लेकिन सबसे अलग थी वो—एक वैंपायर, जो सुहागन की तरह सजी थी।लाल साड़ी…लंबे खुले बाल…माथे पर हल्का सा तिलक…लेकिन आँखों में अब भी वो रहस्यमयी गहराई थी।लोग उसे देखकर रुक गए…लोग बोले - ये कौन है…?क्या ये सच में मंदिर आई है…?किसी ने फुसफुसाया—इतनी सुंदर… पर इतनी अजीब भी…कृष्णा उसके पास खड़ा था…उसके चेहरे पर