इश्क और अश्क - 83

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मंत्रों की आवाज़ महल में गूँज रही थी।धीमी। गहरी।हर शब्द जैसे हवा में घुल रहा हो — पर प्रणाली के कानों तक पहुँच नहीं रहा था।वो बैठी थी — दुल्हन के वस्त्रों में। लाल। भारी। सुंदर।पर अंदर से —खाली।आज के बाद सब बदल जाएगा।उसने हाथ देखे — मेहंदी थी। हल्दी की पीलाहट थी।यही तो चाहते थे सब।यही सही है।पर दिल —दिल एक ही सवाल पूछता था —तो फिर इतना भारी क्यों है?उसने आँखें बंद कर लीं।और उसी अँधेरे में —एक चेहरा था।वही आँखें। वही मुस्कान।"जाओ।"प्रणाली ने होंठ भींच लिए।जाने दो।जाने दो उसे।उधर —महल के बाहर।वर्धान खड़ा था।अकेला।भरोसेमंद सैनिक दूर थे।वो