ऋगुवेद सूक्ति-- (४१) की व्याख्या ऋगुवेद सूक्ति--"आर्य ज्योतिरग्रा:"ऋगुवेद-७/३३/७भावार्थ --आर्य ज्योति को प्राप्त करने वाला होता है। मंत्र-“आर्य ज्योतिरग्राः …” — ७/३३/७भावार्थ--यह मन्त्र बताता है कि आर्य (श्रेष्ठ, सदाचारी, सत्य और धर्म का अनुसरण करने वाला मनुष्य) अंततः ज्योति (ज्ञान, सत्य और दिव्य प्रकाश) को प्राप्त करता है।अर्थात—जो मनुष्य सत्कर्म, सत्य, तप और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करता है। इसलिए यहाँ “आर्य” शब्द जाति के अर्थ में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ आचरण वाले मनुष्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।सामान्य अर्थ--आर्य = श्रेष्ठ आचरण वाला मनुष्यज्योति = ज्ञान, सत्य और आध्यात्मिक