अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 6

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दोहा:११माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥कथा: "गिनती का खेल"एक व्यक्ति पिछले बीस वर्षों से रोज़ सुबह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर माला जपता था। वह अपनी माला के मोतियों को बहुत तेज़ी से घुमाता और मन ही मन गर्व करता कि उसने आज पाँच हज़ार बार ईश्वर का नाम लिया है। उसे लगता था कि वह शहर का सबसे बड़ा 'भक्त' है।एक दिन एक बच्चा उसके पास आया और पूछा, "बाबा, आप ये मोती क्यों गिन रहे हैं?" उस आदमी ने चिढ़कर कहा, "मैं भगवान का नाम ले रहा