आधा रास्ता लाज भरी खामोशी में तय हो चुका था। सन्नाटा इतना गहरा था कि हमारे पैरों की आहट भी सुनाई दे रही थी। मेरे बोलने के तमाम प्रयास विफल हो चुके थे। शब्द होठों तक आते और ठहर जाते। मैं पल्लवी से दो कदम आगे था; वह मेरे बराबर आई और बोली, "प्रसाद ले लीजिए।" बातचीत की शुरुआत औपचारिकता से होती है और प्रेम की आकर्षण से; और यह औपचारिकता ही आकर्षण को प्रेम बनाती है। पल्लवी ने खामोशी तोड़ दी थी। "हाँ, लाओ।" मैंने कहा और उसने प्रसाद मुझे दे दिया। "क्या मन्नत थी जो आज पूरी हो गई?" मैंने कुछ