रात — वही कमरा। हल्की रोशनी… बाहर धीमी हवा…श्राव्या अब थोड़ा संभल चुकी है… कृषांत उसके सामने खड़ा है… दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए सुकून…।धीरे-धीरे… दोनों करीब आते हैं…। श्राव्या की साँसें तेज़… कृषांत का हाथ उसके चेहरे पर…।दोनों के होंठ बस मिलने ही वाले होते हैं…तभी — अचानक कमरे की लाइट ज़ोर से टिमटिमाती है…। झटाक!!! ठंडी हवा का तेज़ झोंका… खिड़की अपने आप खुल जाती है…।श्राव्या का शरीर एकदम से कांपने लगता है…उसकी आँखें धीरे-धीरे हरी चमकने लगती हैं…। वो कृषांत को जोर से धक्का देती है…।कृषांत (चौंककर) बोला - श्राव्या!!श्राव्या सीधी खड़ी हो जाती है…चेहरे पर