जाड़ों में जब वृक्ष एकदम रूखे और नंगे हो जाते हैं यहां तक कि उनकी चमड़ी भी उधड़ने लगती है, तब झील की ओर से ठंडी तेज हवा वैसे ही हाहाकार करती हुई उठती है जैसे बर्फ से जमी हुई ठोस झील से आती हवाएं! मेरा अकेलापन मुझे कुछ यूं ही कचोटने लग जाता है और बांसों के जंगल की चुभीली पत्तियों सी चुभन तन बदन में चुभने लग जाती है। केवल अकेलापन, नितांत अकेलापन! वृक्षों की उधड़ती चमड़ी पर नज़र टिकी थी कि तभी लगा पीठ पर एक छोटा सा बालक मुझ से लिपटा है जिसकी नन्ही- नन्ही