दस दिन की बेचैनी, दुआओं, और देखभाल के बाद…आज देव जी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल रही थी।महक के मन में एक अजीब-सी राहत थी — जैसे कोई अपना ठीक हो गया हो।पिछले कई दिनों से वह हर दिन सूप, दलिया या खिचड़ी बनाकर अस्पताल भिजवा रही थी।हर बर्तन में वो सिर्फ स्वाद नहीं, अपना मन, अपनी परवाह भी परोस देती थी।उसे खुद भी नहीं पता था ये सब क्यों कर रही है… बस अच्छा लगता था।देव जी के लिए कुछ करना, जैसे उसकी आत्मा को तसल्ली देता। ----------------उस रात नींद