विचारों का संग्राम

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विचारों का संग्राम(उपशीर्षक: क्या मैं आस्तिक हूँ?)प्रातःकाल का समय था।पूरा नगर अभी नींद की गोद में था, पर पंडित सम्पूर्ण झा के आँगन से संस्कृत श्लोकों की मधुर, स्पष्ट ध्वनि उठ रही थी।वह ध्वनि ऐसी लगती थी मानो कोई शांत नदी धीरे-धीरे बह रही हो और वातावरण को पवित्र कर रही हो।पंडित सम्पूर्ण झा ने घोर परिश्रम से गीता और रामायण के सभी श्लोक कंठस्थ कर लिए थे।उनकी विद्वता केवल ज्ञान तक सीमित नहीं थी—उनकी वाणी में ऐसी शक्ति थी कि श्रोता स्वयं को कथा में खो देते थे।संध्या के समय जब मंदिर में दीपों की पंक्तियाँ जगमगातीं, धूप