सुबह की हल्की धूप परदे के किनारों से भीतर आ रही थी। सृष्टि की नींद धीरे-धीरे खुली। कुछ पल उसे समझ नहीं आया वो कहाँ है। फिर उसे एहसास हुआ, वो कबीर की बाँहों में है।उसका सिर उसके कंधे पर टिका हुआ। कबीर की बाँह उसके चारों ओर, मजबूती से…पर नरमी के साथ।पहले जैसी घबराहट नहीं हुई। दिल नहीं धड़का बेकाबू होकर।साँस नहीं अटकी। क्योंकि आज उसकी पकड़ में दबाव नहीं था—ज़िम्मेदारी थी।सृष्टि ने हल्का सा सिर उठाया। कबीर अभी भी सो रहा था। उसका चेहरा शांत था। जैसे किसी पहरेदार की तरह रात भर जागता रहा हो। सृष्टि ने