ज़ख्मों की शादी - 23

(73)
  • 762
  • 417

सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी। सृष्टि अभी भी थोड़ी झिझकी हुई थी। वो उठकर बैठ गई। बाल बिखरे हुए। चेहरे पर हल्की थकान। कबीर भी उठकर बैठ गया, पर उसने दूरी बनाए रखी। कुछ पल दोनों चुप रहे।फिर सृष्टि ने धीरे से कहा—कल रात… अगर आप नहीं होते…उसकी आवाज़ रुक गई। कबीर ने बीच में नहीं टोका। बस सुनता रहा।वो बोली - मुझे लगा था मैं फिर से… सब कुछ खो दूँगी।कबीर ने गहरी साँस ली।कबीर ने ने शांत स्वर में कहा -मैंने बहुत गलतियाँ की हैं,पर अब मैं तुम्हारी ढाल बनना चाहता हूँ… डर नहीं।सृष्टि ने