ज़ख्मों की शादी - 20

कबीर कुछ बोलने ही वाला था। उसके होंठ खुले…शब्द जैसे बाहर आने को तैयार थे।तभी सृष्टि की धीमी लेकिन ठहरी हुई आवाज़ आई—मुझे कोई बात नहीं सुननी…Please… मुझे सोने दीजिए।Disturb मत कीजिए।उसकी आवाज़ थकी हुई थी। टूटी हुई। पर साफ़। कबीर जड़ हो गया। सृष्टि ने आँखें बंद रखीं, पर उसकी पलकों के कोनों से आँसू चुपचाप निकल आए।वो फिर बोली - वैसे भी…बहुत महीनों से आपने मुझे रातों को सोने नहीं दिया…बस दिया तो दर्द ही दिया…अपनी हैवानियत दी…ज़ख्म दिए…।हर शब्द जैसे कमरे की हवा को काट रहा था। कबीर की साँस रुक गई। सृष्टि ने करवट बदली। उसकी पीठ