ज़ख्मों की शादी - 19

  • 204
  • 69

सृष्टि शॉवर के नीचे फर्श पर बैठी थी। पानी लगातार उसके सिर, कंधों और शरीर पर गिर रहा था। पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो बिल्कुल खामोश थी। इतनी खामोश कि जैसे उसके भीतर की सारी आवाज़ें थककर बैठ गई हों। उसकी आँखें खुली थीं…पर उनमें कोई चमक नहीं थी।वो बोली - क्यों हुआ ये सब? मेरी क्या गलती थी?हर गिरती हुई बूंद के साथ उसे फिर वही रातें याद आने लगीं—कबीर का गुस्सा…उसकी सख्त पकड़…सृष्टि का डर…उसकी बेबसी। उसका शरीर अनजाने में ही सिकुड़ने लगा। उसने अपने हाथों से खुद को ढक लिया, जैसे कोई खुद को बचाने