अगस्त्य का यह रूप कोई नया नहीं था…यह वही था, कोई अलग इंसान नहीं।और चाहे अगस्त्य हो या वर्धन, दोनों अपनी ज़िद के पक्के थे…इसका मतलब था—सय्युरी को अगस्त्य के सवालों के जवाब देने ही होंगे।सय्युरी ने धीरे से कहा,“ठीक है… जाओ फिर।”अगस्त्य की आँखों में दृढ़ निश्चय जाग रहा था…और उसने सीधे पूछा,“मुझे वो रास्ता बताओ, जिससे प्रणाली पारस के लिए गरुड़ पुष्प लेने गई थी!”सय्युरी अजीब सा मुँह बनाते हुए उसकी तरफ देखी—“तुम्हें उस रास्ते से क्यों जाना है?”अगस्त्य के हाथ धीरे से कस गए…उसकी साँसें तेज हो गईं… और आँखों में एक ऐसी ज़िद की चमक थी—जो