शाम के चार बज चुके थे...महक मुँह-हाथ धोकर आँगन में बैठी थी...धीरे-धीरे ढलती धूप की सुनहरी किरणें आँगन के एक कोने में सिमटने लगी थीं...महक की उंगलियाँ बार-बार उन्हीं किरणों को छूने की कोशिश कर रही थीं...जैसे कोई मासूम सा सपना हथेलियों में समेट लेना चाहती हो...तभी बाहर सड़क पर एक सफेद मारुति कार आकर रुकी...महक ने दरवाजे की ओट से झाँककर देखा...एक भारी-भरकम आदमी... हाथ में फाइलें थामे...सीधा दरवाजे की घंटी पर उँगली रख दी...महक का दिल जोर से धड़कने लगा..."क्या बड़े बाबू आ गए?" उसने खुद से सवाल किया...और जल्दी से दौड़कर अंदर चली गई...दरवाजा उसकी सास ने