भक्त प्रह्लाद - 15

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पर्वत ने किया नमनसूर्योदय के साथ अंधकार दूर हुआ। हड़बड़ाहट में हिरण्यकशिपु अपने शयनकक्ष से बाहर आया। यह हड़बड़ाहट उसके भय की नहीं, बल्कि उसकी प्रसन्नता की थी। उसे यह विश्वास था कि कोठरी में बंद प्रह्लाद को सर्पों ने अपनी विषैली फुफकार से ही धराशायी कर दिया होगा। उसका शत्रु-हितैषी अब जीवित नहीं होगा। यही सोचकर वह कुछ मंत्रियों के साथ अपनी संतुष्टि के लिए उस कोठरी की ओर तेज कदमों से बढ़ा जा रहा था, जिसमें प्रह्लाद बंद था।जब हिरण्यकशिपु कोठरी के द्वार पर पहुँचा और फिर उसके अंदर का दृश्य देखा तो वह भौचक्का रह गया। उसका सारा