सपनों की डोली। - 4

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_जिस दिन वह गया...-एक सुबह के बाद सबकुछ बदल गया।वह अपनी लाचारी पर भावुक हो चुकी थी ,उस रात विकास नगर के बादल ही नहीं नारायणी की आँखें भी बरस रही थीं। टिप टिप टिप...बिजली कड़कने की आवाजें...और यह रात का सन्नाटा उसके शरीर को किसी आंधी में झकझोरे जा रहे वृक्ष के भांति तन से जड़ उखाड़ फेंकने की ताक में थे।जैसे-जैसे दीवारों पर सीलन पसर रही थी वैसे वैसे उसकी आँखें बंद हो गईं, वह गहरी नींद में सो गई।रात भर की किचकिचाहट के बाद सुबह फिर वही बारिश,अगली भोर तो इतवार की थी, इस लिए उसने बच्चों