घर लौटती पगडंडी

  • 2.3k
  • 880

कहानी: घर लौटती पगडंडी मचान पर खड़ा ज्ञान सिंह दूर तक फैले खेत को देख रहा था। गेहूं की सुनहरी फसल अब कटकर ढेरों में बदल चुकी थी। हवा में भूसे की हल्की गंध तैर रही थी। उसने आंखें मिचमिचाकर देखा—कोई पौधा खड़ा तो नहीं रह गया? “दद्दा… अब तो जाने दो न!” नीचे से एक पतली सी आवाज आई। ज्ञान सिंह ने झुककर देखा—तीन-चार बच्चे हाथ जोड़कर खड़े थे। उनके मैले-कुचैले कपड़े, सूखी आँखें और उम्मीद से भरे चेहरे किसी भी पत्थर दिल को पिघला सकते थे। “अरे, तुम लोग अभी तक यहीं हो?” उसने हल्की झुंझलाहट में कहा,