डर

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                                                          डर   शाम उतर रही थी—धीरे-धीरे, जैसे किसी बूढ़े लेखक की कलम थककर कागज़ पर रेंग रही हो। दफ्तर की घड़ी ने पाँच बजाए, और दिनेश ने अपनी कुर्सी से उठते हुए एक लंबी साँस ली। वह साँस केवल थकान की नहीं थी—वह वर्षों से जमा एक अदृश्य बोझ की थी, जिसे वह हर शाम अपने साथ घर ले जाता था।   फाइलों के ढेर पर एक नज़र डालकर वह मुस्कराया—“कागज़… तुम सच में कितने हल्के हो, और तुम्हारा बोझ कितना भारी…”   बाज़ार आज उसे वैसा नहीं लगा, जैसा वह रोज़ देखता था। हर दुकान एक आईना थी—और