दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-5)

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Part 5: वो एहसास, जिसे नाम मिल गयारात गहरी हो चुकी थी।आसमान पर चाँद था, मगर उसकी रोशनी भी जैसे अधूरी लग रही थी।शायद इसलिए… क्योंकि कुछ कहानियाँ चाँदनी में नहीं, अँधेरे में लिखी जाती हैं।कबीर अपने कमरे में था।खिड़की के पास खड़ा, दूर शहर की लाइट्स को देख रहा था।हर चमकती हुई रोशनी उसे Myra की याद दिला रही थी।उसकी आँखें… उसकी आवाज़…और वो अनकहा डर, जो हर बार उसकी बातों में छुपा होता था।“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”उसके कानों में फिर वही शब्द गूंजे।कबीर ने गहरी सांस ली।“फिर भी मैं गया…”उसने खुद से कहा।क्यों?इस सवाल का जवाब