"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"भाग 21: “जनसभा का धमाका… सच बनाम सत्ता”रचना: बाबुल हक़ अंसारीपिछले खंड से…“पापा…कल आपका इंसाफ़ होगा।” जनसभा का आगाज़अगली सुबह शहर का सबसे बड़ा मैदान लोगों से खचाखच भरा था।झंडे लहरा रहे थे, नारे गूंज रहे थे —“कैलाश पांडे ज़िंदाबाद!”मंच पर बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगी थीं।पुलिस की कड़ी सुरक्षा थी।हर तरफ़ बैरिकेड… हर कोने में निगरानी।मंत्री कैलाश पांडे मंच पर आए —सफेद कुर्ता, चेहरे पर वही आत्मविश्वास भरी मुस्कान।उन्होंने माइक थामा —“मेरे प्यारे शहरवासियों… आज हम विकास की नई कहानी लिखने जा रहे हैं…”भीड़ तालियों से गूंज उठी।लेकिन भीड़ के बीच…तीन चेहरे चुपचाप खड़े थे —अनया, आर्या और