बोधिवृक्ष और हम

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प्रियांशी की नींद अचानक टूटी, वह हड़बड़ाकर जागी और घबराते हुए बोली, "अरे... क्या हुआ?"​अंकिता ने चुटकी लेते हुए मज़ाक किया, "कुछ नहीं हुआ... बस सुबह हो गई है! अब उठ भी जाओ... जो एक-दूसरे की गोद में सिर रखकर सो रहे थे।" अंकिता की बात सुनकर हम तीनों के चेहरों पर एक हल्की-सी मुस्कान तैर गई।​हम हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हुए ही थे कि ट्रेन में घोषणा हुई—हमारा स्टेशन करीब ही था। मैंने जल्दी से आवाज़ दी, "अंकिता, प्रियांशी... जल्दी करो, गया स्टेशन आने वाला है।"​कुछ ही देर में ट्रेन की रफ्तार धीमी हुई और वह प्लेटफॉर्म पर आकर रुक