रोहन ने उस दिन पहली बार घर का दरवाज़ा बहुत धीरे खोला था।जैसे अंदर कोई सो रहा हो।जैसे हल्की आवाज़ भी किसी को जगा देगी।जैसे अब भी इस घर में रिया की सांसें बची हों।लेकिन घर बहुत चुप था।वही चुप्पी, जो किसी के जाने के बाद दीवारों पर चिपक जाती है।वही चुप्पी, जो हर सुबह, हर शाम, हर कोने में अपना नाम लिख देती है।रोहन ने जूते उतारे।बैग कुर्सी पर फेंका।और बिना कुछ बोले सीधे उस कमरे में चला गया, जहाँ रिया की चीज़ें वैसे ही रखी थीं, जैसे वो बस अभी वापस आने वाली हो।कमरे की मेज़ पर उसकी